
गोपी बचन तथा ब्रजदशा
पंथी इतनी कहियौ बात |
तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात ||
बकी अघाशुर टरत न टारे, बालक बनहिं न जात |
ब्रज पिंजरी रुधि मानौ राखे, निकसन कौं अकुलात ||
गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात |
परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिं अवलंबैं तात ||
कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत |
यह व्यवहार आजु लौं हैं ब्रज, कपट नाट छल ठानत ||
दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट |
आँखनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट |
ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकहीं पेट |
सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ||57||
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217