
मथुरा प्रवेश तथा कंस बध
नवल नंदनंदन रंगभूमि राजैं |
स्याम तन, पीत पट मनौ घन में तड़ित, मोर के पंख माथैं बिराजैं ||
स्रवन कुंडल झलक मनौ चपला चमक, दृग अरुन कमल दल से बिसाला |
भौंह सुंदर धनुष, बान सम सिर तिलक, केस कुंचित सोह भृंग माला ||
हृदय बनमाल, नूपुर चरन लाल, चलत गज चाल, अति बुधि बिराजैं |
हंस मानौ मानसर अरुन अंबुज सुभर, निरखि आनंद करि हरषि गाजैं |
कुबलया मारि चानूर मुष्टिक पटकि, बीर दोउ कंध जग-दंत धारे |
जाइ पहुँचे तहाँ कंस बैठ्यौ जहाँ, गए अवसान प्रभु के निहारे ||
ढाल तरवारि आगैं धरी रहि गई , महल कौ पंथ खोजत न पावत |
लात कैं लगत सिर तैं गयौ मुकुट गिरि, केस गहि लै चले हरि खसावत |
चारि भुज धारि तेहिं चारु दरसन दियौ, चारि आयुध चहूँ हाथ लीन्हे |
असुर तजि प्रान निरवान पद कौं गयौ, बिमल मति भई प्रभु रूप चीन्हे ||
देखि यह पुहुप वर्षा करि सुरनि मिलि, सिद्द गंदर्व जय धुनि सुनाई |
सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परति, सुरनि की गति तुरत असुर पाई ||27||
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See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217