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सूरदास

श्रीकृष्णबाल-माधुरी

राग केदारा

देखि री नंद-नंदन ओर |
त्रास तैं तन त्रसित भए हरि, तकत आनन तोर ||
बार-बार डरात तोकौं, बरन बदनहिं थोर |
मुकुर-मुख, दोउ नैन ढ़ारत, छनहिं-छन छबि-छोर ||
सजल चपल कनीनिका पल अरुन ऐसे डोंर (ल) |   
रस भरे अंबुजन भीतर भ्रमत मानौ भौंर ||
लकुट कैं डर देखि जैसे भए स्रोनित और |
लाइ उरहिं, बहाइ रिस जिय, तजहु प्रकृति कठोर ||
कछुक करुना करि जसोदा, करति निपट निहोर |
सूर स्याम त्रिलोक की निधि, भलैहिं माखन-चोर ||

भावार्थ :-- (गोपी कहती है-) `सखी (यशोदाजी) नन्दनन्दन की ओर देखो ! भयसे कंपित
-शरीर होकर श्यामसुन्दर तुम्हारे मुखकी ओर देख रहें हैं | बार बार तुमसे डर रहें
हैं, मुखकी कान्ति घट गयी है, क्षण-क्षणपर दोनों नेत्रोंसे दर्पणके समान निर्मल
कपोलोंपर अश्रु ढुलका रहे हैं ! ये तो शोभाकी सीमा हैं, अश्रुभरे पलक हैं तथा चञ्चल
पुतलियोंपर ऐसे लाल डोरे हैं, मानो रसभरे कमलोंके भीतर भौरें घूम रहे हों ! छड़ीके
भयसे ये नेत्र ऐसे दीखते हैं जैसे औरभी लाल हो उठे हों! इन्हें हृदयसे लगा लो,
चित्तसे क्रोध दूर करदो और इस कठोर स्वभावको छोड़ दो | यशोदाजी, मैं अत्यन्त
निहोरा (अनुनय) करती हूँ, कुछ तो दया करो |' सूरदासजी कहते हैं - श्यामसुन्दर
भले माखन-चोर हों, परंतु वे त्रिलोकी की निधि हैं |

National Record 2012

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Bihar became the first state in India to have separate web page for every city and village in the state on its website www.brandbihar.com (Now www.brandbharat.com)

See the record in Limca Book of Records 2012 on Page No. 217